सोमवार, 2 मई 2011

ओबामा ओसामा और अमेरिका

ओबामा ओसामा और अमेरिका        ये ऐसा त्रिकोण है जिसे समझने के लिए १९७९ से १९८८ के अफगानी गृह युध  की सरजमीं को तलाशना होगा जहा से अमेरिका और ओसामा के संबंधो की शुरुआत होती है दरअसल आज अमेरिका को जिस लड़ाई को लड़ते ९ साल २०६ दिन गुजर  गए तब जाकर अम्रेरिका ने ओसामा बिन लादेन के डीएनए की पुस्ती कर अपने मन को तसल्ली दी की जिस ओसामा बिन लादेन को मारने की कसम उसने खाई थी उसमे उसने सफलता पा ली है ..............दरअसल ओसामा बिन लादेन कोई आतंकी नहीं अमेरिका का ऐसा डर था जिसे खुद अमेरिका ने १९७९ से १९८८ के समय अफगानी गृह युद्ध  के समय सोवियत संघ की बढती साम्यवादी सक्ती को रोकने के लिए अपने ढाल के रूप में इस्तेमाल किया था
                                                                                                                जब जब ओसामा बिन लादेन की बात होती है तो कही न कही weakileaks के उस खुलासे को बल मिलता है जिसे  जुलियन असान्जे ने weakileaks के अपने  websait के केबल के माध्यम से अमेरिका की विदेश नीतियों की हवा निकाल दी  तथा उसकी विदेश नीतियों पर ऐसा प्रश्न चिन्ह लगा दिया जिसे शीत युद्ध के बाद कही न कही अमेरिका विश्वसनीय साबित करने की कोशिश कर रहा था 
                                                         दरअसल असान्जे ने अमेरिका बची खुची विदेश नीतियों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिंह लगा दिया है जीसे अमेरिका कही न कही दसको से कायम करने में लगा है ओसामा अमेरिका की उसी नीतियों का ऐसा आइना है जिसमे अमेरिका की अपनी नीतियों  की गाड़ी जिसपर अमेरिका सवार की हवा निकाल दी जिसपर चढ़कर अमेरिका ने कभी सोवियत संघ को अफगानिस्तान में धुल चटाई थी और तब कही न कही भारत के सोवियत संघ की ओर झुकाव को गलत साबित करने की कोशिश की थी ..............लेकिन दुसरे को ब्रस्ट करने के लिए उछाली गई किल जब अपने ही पैरो में चुभती है तो तन के साथ साथ मन भी कैसे आहत होता है यह आज अमेरिका से बेहतर कोई जान नहीं सकता और कल का अपना ही हरकारा जब अपने ही खिलाफ लाठी ताने खड़ा ही जाये तो उसे परास्त करना कितना मुश्किल होता है क्युकी  वह अपने सारे दाव पेच सिख चूका होता है
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   वह ऐसी भूल अमेरिका कर चूका था  जिसका परिणाम वह आज तक लगातार भुगत रहा है ९ सितम्बर २०११ यही वह तारीख थी जब ओसामा ने अमेरिका को खुली चुनोती दी थी और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर तास के पतों की मानिंद बिखर गया था ................. तब बुश ने कही न कही अमेरिका की दुनिया में चौधरी की उसकी साख बचाने के लिए अफगानिस्तान पर हमला कर दिया तब बुश ने भी यह नहीं सोचा होगा की ओसामा से लड़ते लड़ते उनका राष्ट्रपतित्वा काल भी छोटा पड़ जायेगा और .अमेरिका  इंग्लॅण्ड इटली सरीखे ४८ देशो की सेना भी कम पड़ जाएगी और देश की अर्थव्यवस्था भी इसी एक चौधरियाना अंदाज की भेंट चढ़ जाएगी देश की नाक कहलाने वाले बड़े बैंक तक इसका खामियाजा भुगतेंगे दरअसल यही वह कमजोर कड़ी थी जिसे ओबामा ने पकड़ा और झूठे दंभ के लिए खुद को बर्बाद करने की अमेरिकी नीतियों को ढील दी तथा सबसे प्रमुखता अफगानिस्तान की लड़ाई को न देकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दी भले ही वह सुस्त रही हो . 
                             ..........................और शायद ओबामा की इसी दूरदर्शी सोच ने  नोबेल कमिटी के सदस्यों का मन मोह लिया तथा अहिंसा के रास्ते जीवनपर्यंत चलकर गाँधी मरणोपरांत आजतक नोबेल से मरहूम रहे उसे ओबामा ने एक झटके में हासिल कर लिया जो भी हो ओबामा इस मायनो में बुश से बेहतर है की वह अमेरिकियो की कमी का मूल्य समझते है और अमेरिकी दंभ से ज्यादा मूल्यवान उन्हें अमेरिकी लगते है  देर से ही सही ओबामा ने अमेरिका आज ओसामा नहीं रहे लेकिन ओबामा ने ओसामा की समाधी भी न रहने दी की काल कही वह काल फिर किसी ओसामा का प्रेरनास्थल न बन जाये ओसामा के शव को समंदर में दफना दिया ओसामा के मरने के साथ ही अमेरिका की use and throw की उसकी एक निति उजागर हुई पाकिस्तान को उस से कुछ सिख लेनी चाहिए ....................

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